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Smart City Project: Green Trees Being Slaughtered In The Name Of Shifting -

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Smart City Project: Green Trees Being Slaughtered In The Name Of Shifting

Smart City Project: Green Trees Being Slaughtered In The Name Of Shifting
राजधानी भोपाल में एक बार फिर पेड़ों की शिफ्टिंग के नाम पर बेजुबान वृक्षाें का खुलेआम कत्ल किया जा रहा है।  साथ ही आम आदमी का पैसा भ्रष्टाचार की बलि चढ़ाया जा रहा है। इसके पूर्व भी नगर निगम अलग-अलग प्रोजेक्ट्स में लाखों रुपए शिफ्टिंग के नाम पर बर्बाद कर चुका है, लेकिन इस बार यह राशि तकरबीन 1 करोड़ रुपए के भी ऊपर है। 
 
दरअसल स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत टीटी नगर स्मार्ट सिटी के नाम पर शहर की हरियाली को भ्रष्टाचार की बलि चढ़ाया जा रहा है। यहां से तकरीबन 850 पेड़ों को शिफ्ट कर कलियासोत नदी के किनारे चंदनपुर में शिफ्ट किया जाना है, जिसमें से करीब 100 पेड़ शिफ्ट भी कर दिए गए हैं, लेकिन इनके बचने की उम्मीद न के बराबर है। जानकारी के अनुसार इस बार प्रत्येक वृक्ष की शिफ्टिंग के लिए 15 हजार रुपए का बजट रखा गया है। 

(पीपल के इस पेड़ के तने को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसकी उम्र तकरीबन 100 साल होगी, इसे भी बेदर्दी से काट दिया गया है।)

वैज्ञानिक ढंग से नहीं हुई है शिफ्टिंग : 
दरअसल यहां से पेड़ों की शिफ्टिंग के दौरान वैज्ञानिक मानकों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है। शिफ्टिंग के दाैरान प्रत्येक पेड़ के बीच कम से कम 20 फीट का अंतर होना चाहिए लेकिन चंदनपुर में 2 से 4 फीट की दूरी पर पेड़ रोप दिए गए हैं। इससे पेड़ों की जड़ों को विकसित होने का समय ही नहीं मिलेगा। जिसके कारण पेड़ों के जीवित बचने का प्रतिशत कम हो जाएगा।  

पेड़ों के कत्ल का टेंडर दिल्ली की रोहित नर्सरी के पास : 
इस बार वृक्षों को कत्ल करने का टेंडर दिल्ली की राेहित नर्सरी को दिया गया है। प्रत्येक पेड़ को शिफ्ट करने के दौरान केवल उसकी टहनियां ही छांटनी थी, जबकि अनुभवहीन कंपनी ने प्रत्येक पेड़ को सीधे तने से काटा है। साथ ही जड़ाें को भी सावधानी पूर्वक नहीं निकाला गया है। इससे वृक्ष के बचने की उम्मीद बेहद कम हो गई है। 

(ज्यादातर वृक्षों के बीच अंतर वैज्ञानिक मानक के आधार पर नहीं हैं)

चंदनपुर में जहां-जहां वृक्षों को लगाया गया है। वहां जमीन के ऊपर से ही मुख्य जड़ को आसानी से देखा जा सकता है। वृक्ष को लगाने के दौरान भी सही तरह से गड्‌ढा नहीं किया गया है। इससे इसके बचने की उम्मीद बेहद कम है। वहीं इस पूरे प्रोजेक्ट के सुपरवाइजर अभिमन्यु के अनुसार सारे वृक्ष 2 से 5 फीट की दूरी पर लगाए गए हैं, फिलहाल पेड़ों की शिफ्टिंग का काम बंद कर दिया है। वन विभाग से बाकि के वृक्ष लगाने के लिए भूमि आवंटित नहीं की गई है।
स तरह होती है पेड़ों की शिफ्टिंग : 
एक 5 साल पुराना पीपल का पेड़ 50 फीट ऊंचा होता है। इस पेड़ को शिफ्ट करने के लिए सर्वप्रथम उसकी टहनियों की छटनी करनी होती है, जिससे उसे वाहन में रखने में आसानी हो। किसी भी वृक्ष की मुख्य जड़ सीधे नीचे जाती है, जबकि छोटी जड़े वृक्ष के चारों ओर फैलती हैं। इसलिए शिफ्टिंग के दौरान सर्वप्रथम वृक्ष के चारों ओर 6 से 7 फीट व्यास का गोला खींच कर लगभग 7 फीट गहराई तक खुदाई
करनी होती है।

इसके बाद वृक्ष को निकालकर उसकी जड़ों को गीले कपड़े से लपेट कर दूसरी जगह शिफ्ट किया जाता है। जिस जगह वृक्ष को लगाना है। वहां 7 फीट गहरा गड्‌ढा खोदकर वृक्ष लगाना होता है। इस पूरी प्रक्रिया में 3 से 4 दिन का समय लगता है और पूरे कार्य को बेहद सावधानी पूर्वक किया जाता है। एक वृक्ष को शिफ्ट करने में तकरीबन 12 से 15 हजार रुपए की लागत आती है। 

मुख्य जड़ वृक्ष तक पहुंचाती है पानी : 
वृक्ष की मुख्य जड़ का कार्य जमीन से पूरे वृक्ष तक पानी पहुंचाना होता है। साथ ही आसपास की छोटी जड़ें वृक्ष को स्थायित्व देने और पोषक तत्वों के संग्रहण का कार्य करती हैं। इसलिए इनका प्रत्यारोपण सावधानी पूर्वक होना चाहिए। साथ ही वृक्ष की केवल छोटी टहनियों की ही छटाई होना चाहिए, जिससे तने से वृक्ष काट देने से भी इसके बचने की उम्मीद कम हो जाती है

(इस तरह का गंदा खेल पहले भी कई बार खेला गया है, तब भी एक भी वृक्ष जिंदा नहीं बचा था)

पहले भी चलता रहा है भ्रष्टाचार का गंदा खेल  : 
बीआरटीएस और गैमन इंडिया प्रोजेक्ट के दौरान होशंगाबाद रोड स्थित नटबाबा मंदिर से 18 से ज्यादा पेड़ मिसरोद विश्राम घाट शिफ्ट किए गए थे। साथ ही बैरागढ़ और लालघाटी से कई पेड़ों को सीहोर नाके शिफ्ट किया गया था। इनमें से किसी भी पेड़ को बचाया नहीं जा सका था। इस दौरान प्रत्येक पेड़ पर नगर निगम ने 10 हजार से ज्यादा खर्च कर 10 लाख रुपए शिफ्टिंग में बर्बाद किए थे, लेकिन शिफ्ट किए गए तकरीबन 100 पेड़ों में से किसी को भी नहीं बचाया जा सका था। इस तरह से भ्रष्टाचार का यह गंदा खेल पहले भी चलता रहा है। 

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